google.com, pub-1112571912339708, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Link: https://example.com; rel=canonical health knowlede,प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति को क्या कहा जाता था?

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health knowlede,प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति को क्या कहा जाता था?

   health knowlede,प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति की विशेषता कहा जाता था?


सुश्रुत संहिता

‘सुश्रुत संहिता, जो भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन करती है, को भारतीय चिकित्सा साहित्य में सबसे शानदार रत्नों में से एक माना जाता है।
इसमें 184 अध्यायों में 1,120 बीमारियों के 700 औषधीय पौधों, खनिज स्रोतों की 64 तैयारी और पशु स्रोतों के आधार पर 57 तैयारियां शामिल हैं।
पाठ में आग लगने, जांच करने, विदेशी निकायों के निकासी, क्षार और थर्मल दाग़ना, दाँत निष्कर्षण, छांटना, और जलोदर के रोग मे शरीर से पानी निकालने का यंत्र निकालने के लिए सर्जरी तकनीक, हाइड्रोसेल और जलोदरग्रस्त तरल पदार्थ निकालने, प्रोस्टेट ग्रंथि हटाने, यूरिथ्रल सख्त फैलाव, वेसीकोलिथोटोमी, हर्निया सर्जरी, सीज़ेरियन सेक्शन, हेमोराइड्स का प्रबंधन, फिस्टुला, लैप्रोटोमी और आंतों में बाधा का प्रबंधन, छिद्रित आंतों और पेट के आकस्मिक छिद्रण, ओमेंटम के प्रकोप और फ्रैक्चर प्रबंधन के सिद्धांतों के साथ।
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता के दो भाग हैं, पहले व्यक्ति को पुरा-तंत्र के रूप में जाना जाता है (पांच खंड होते हैं) और दूसरा को उत्तरा-तंत्र के रूप में जाना जाता है।
इसलिए, सुश्रुत संहिता डॉक्टरों के लिए चिकित्सा शिक्षा का एक विश्वकोष है।
पुराणंत्र की पांच किताबें हैं जिनमें 120 अध्याय हैं सतत्र साधना, सरिरा साधना, निदान स्ताना, चिकित्ता रहना और कलापा साधना।
उत्तरात्रा को पूरी तरह से औपद्रविका के रूप में जाना जाता है (सर्जिकल प्रक्रियाओं जैसे हिकको, बुखार, क्रमी-रोगा, पांडू, डाइसेंटरी, खांसी, कमला इत्यादि के कई जटिलताओं का विवरण है। सलकायतंत्र में आंख, कान, नाक की विभिन्न बीमारियों का विवरण है और सिर।)
विरासत

सुश्रुत की सही अवधि अस्पष्ट है लेकिन अधिकांश विद्वानों ने उन्हें 600 से 1000 ईसा पूर्व के बीच रखा है। सुश्रुत ने उस क्षेत्र में अपनी कला को पढ़ा, सिखाया और अभ्यास किया जो वर्तमान में भारत के उत्तरी हिस्से में वाराणसी (काशी, बनारेस) शहर से मेल खाता है।
सुश्रुत के अनुयायियों सुश्रुतास के रूप में कहा जाता था। नए छात्र से कम से कम 6 साल तक अध्ययन करने की उम्मीद थी।
उन्होंने विभिन्न प्रयोगात्मक मॉड्यूल पर अपने छात्रों को शल्य चिकित्सा कौशल सिखाया, उदाहरण के लिए, सब्ज़ियों (जैसे तरबूज, गोर, ककड़ी इत्यादि) पर चीरा

आयुर्वेद आयुष और वेद इन दोनों शब्दों को मिला देने से आयुर्वेद बना है आयुष का संबंध जीवन से तथा बीच का संबंध ज्ञान और विज्ञान से होने के कारण आयुर्वेद जीवन संबंधी विज्ञान का नाम हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है।

हिताहितम सुखम दुःखम आयुस्त्स हिताहितम ।

मानम च तचच यात्रोक्तम आर्युवेद: स उच्यते।।

अर्थात जिसके माध्यम से आयु के हित अहित का ज्ञान हो और उसका परिणाम प्राप्त हो उस ज्ञान को आयुर्वेद कहते है।
संपूर्ण विश्व में आयुर्वेद को मानवीय सभ्यता की प्राचीनतम लिखित चिकित्सा के रूप में मान्यता मिली हुई है

आधुनिक विद्वानों के अनुसार कम से कम 3000 वर्ष पूर्व आयुर्वेद का जन्म हुआ और आज से लगभग 2800 वर्ष पूर्व इस विद्या को पुस्तकों ग्रंथों शास्त्रों की रचना भी प्रारंभ हो गई थी।

मान्यता है कि मानवता की रक्षा के लिए हम लोगों के विनाश के लिए सृष्टि रचयिता प्रजापति ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद पर एक लाख श्लोकों वाले ग्रंथ ब्रह्मा संहिता की रचना की तथा विज्ञान को दक्ष प्रजापति को प्रदान किया। बाद में दक्ष प्रजापति ने यह ज्ञान अश्वनी को मारो को प्रदान किया और अश्विनी कुमारों ने देवराज इंद्र को यह रहस्य समझाया। देवराज इंद्र ने महर्षि भारद्वाज ने इस ज्ञान को ग्रहण कर कृषि पुनर्वसु एवं आत्रय को दिया। अत्रि ऋषि द्वारा रचित आत्रे संहिता को इसी कारण से आयुर्वेद के मूल ग्रंथ के रूप में मान्यता प्राप्त है।

कालांतर में महर्षि चरक ने इसी आत्र्ये संहिता को विस्तृत रूप से प्रदान करते हुए चरक संहिता के नाम से लिखा। महर्षि चरक के अतिरिक्त महर्षि सुश्रुत आयुर्वेद के एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में विश्व विख्यात हैं। उनके द्वारा प्रदत्त ग्रन्थ में आयुर्वेदिक शल्यक्रिया का मूल भाव है। इसके बाद महर्षि वाग्भट में चरक प्रदत्त च कायचकित्सा और सुश्रुत प्रदत्त शल्यक्रिया को जोड़ते हुए अष्टांग ह्रदय नामक ग्रंथ की रचना किया । इसके अतिरिक्त आचार्य शारंगधर द्वारा लिखित शारंगधर संहिता एवं माधवाचार्य द्वारा लिखित माधव निदान भी आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथों में से एक है।

निदाने माधव: श्रेष्ठ सूत्र स्थाने तू बाग भट्ट:।

शरीरे सुश्रुत: प्रोक्त: चरकस्तु  चिकित्सते ।।

धात रोग के निदान ओं का कारण जानने के लिए माधव निदान सूत्रों के लिए भागवत द्वारा रचित अष्टांग हृदय शारीरिक ज्ञान के लिए सुश्रुत संहिता एवं चिकित्सा कार्य के लिए चरक संहिता सर्वोत्तम ग्रंथ है।
आयुर्वेदिक माताअनुसार मानव शरीर की उत्पत्ति  पंचमहाभूता से हुई है।मनुष्य के द्वारा भोजन ग्रहण करने के उपरांत शरीर की क्रिया है उसे भोजन को विषाक्त करना आरंभ कर देती हैं। आयुर्वेद कहता है कि भोजन का स्वाद उसके रस की प्रकृति पर निर्भर उदाहरण के तौर पर मीठा भोजन_ रक्त, मांस, वसा, तथा शक्ति को उत्पन्न करता है। इसी तरह से खट्टे पदार्थ_ पाचन शक्ति बढ़ाते हैं तथा वात का सम्मन वात करते हैं। नमकीन पदार्थ भी बात नाशक होते हैं परंतु का कफ करते हैं।
पाचन के दौरान भोजन से आहार रस पैदा होता है आहार सिर्फ धातु ,धातु से रक्त ,रक्त से मांस,वसा अस्थियां, वीर्य, अस्थि, मज्जा और ओज उत्पन्न होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर की उत्पत्ति का कारण जिस से रोग होते हैं वात, पित्त, कफ, का अ संतुलन है । इसे ही त्रिदोष सिद्धांत कहकर पुकारा जाता है। तथा आयुर्वेद के अनुसार रोगी की परीक्षा नाड़ी परीक्षण, जिह्वा परीक्षण ,त्वचा व अंग परीक्षण ,छाती परीक्षण, मल मूत्र परीक्षण ,तथा शारीरिक परीक्षण के माध्यम से की जाती है।
वात तथा वायु अन्य दोशो व धातुको उनकी जगह पहुंचाने वाली जल्दी चलने वाली रजोगुण युक्त और चंचल मानी गई है। इसमें भी कंठ में उदान वायु, ह्रदय में प्राण वायु,नाभि में समनवायु,
मलाशय में अपान वायु और समस्त शरीर में व्यान मोबाइल का निवास माना गया है
इसी तरह से पित्त को भी पाचक, रंजक ,साधक, आलोचक और भ्राजक नाम उसकी क्रियाओं के भेद के आधार पर दिए गए हैं। कफ को भी कर्म भेद के अनुसार क्लेदन, अवलंबन, रसल, स्नेहन ,और  श्लेषण नाम से पुकारा गया है। इसके परस्पर संबंधों के अनुसार ही आयुर्वेद शास्त्र मानवीय प्रवृत्ति कुछ सात प्रकार माना जाता है जैसे बात प्रकृति, पित्त प्रकृति, कफ प्रकृति, वात कफ प्रकृति, पित्त कफ प्रकृति, वात पित्त कफ प्रकृति।
इसी तरह से आयुर्वेद शरीर में तरह तरह के वेगो को गिनता है।
जिम में मल मूत्र, अधोवायु, वमन इत्यादि आते हैं । इस प्रकार ध्यान से देखें तो आयुर्वेद का विज्ञानिक गंभीर सोच को लेकर रचा गया कालांतर में आयुर्वेद मेंआठ अंग की चिकित्सा हो गए। जिनमे में काय तंत्र (औषधियों के द्वारा चिकित्सा) शालाक्य तंत्र(आंख ,नाक ,मुख इत्यादि से संबंधित रोगों की चिकित्सा) शल्य तन्त्र (चीर फाड़ के द्वारा चिकित्सा) आगत तंत्र (विष से संबंधित रोगों की) भूत विद्या (ग्रहों से संबंधित व मानसिक व्याधियों की शिक्षा) कौमारभृत्य (बच्चों को होने वाले रोगों के चिकित्सा) रसायन तंत्र (वृद्धावस्था के विकारों से मुक्ति दिलाने हेतु कायाकल्प चिकित्सा) तथा वाजीकरण (वीर्य से संबंधित व्याधियों की चिकित्सा) इन रंगों को मिलाकर अष्टांग आयुर्वेद कहा गया है।
आयुर्वेद की नीतियों के आधार पर आचार्य शल्य तंत्र के जनक महाभारत सुश्रुत की आयुर्वेद चिकित्सा का विवरण किया जा रहा है।




भारतीय चिकित्सा विज्ञान के सूत्र सिद्धांतों का वेदों में व्यापक और विस्तृत स्वरूप समाहित है। आ सकता है इनका चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से गहन अवगाहन अन्वेषण करने की। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को लेकर प्रारंभ से ही सजगतापूर्वक वैज्ञानिक रीति से शोध अनुसंधान एवं शिक्षण परीक्षण के कार्य संचालित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के विभिन्न पहलुओं को लेकर यहां महत्वपूर्ण और उपयोगी शोध कार्य पूर्व किए गए हैं एवं आज भी किए जा रहे हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का अपना एक महत्व है परंतु रोगों के सार्थक और स्थाई समाधान की दृष्टि से इसके कई घातक दुष्परिणामों से भी सभी परिचित हैं। साथी सुलभता आर्थिक रूप से भी सभी तक अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधा की पहुंच अभी तक संभव नहीं हो पाई है। ऐसे मैजीसी प्राणी सूत्रों पर आश्रित भारतीय चिकित्सा विज्ञान समुचित विकल्प के रूप में हमारे समक्ष मौजूद है। किसकी व्यापकता सूक्ष्मता ,विशिष्ट तकनीकों को बाहर लाकर जनोपयोगी बनाना समय की एक महती आवश्यकता है।
इसी आवश्यकता की पूर्ति के उद्देश्य देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्राचय अध्य्यन में आयुर्वेद विषय के अंतर्गत शैलय चिकित्सा
के अंतर्गत शल्य चिकित्सा के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण शोधकार्य संपन्न किया गया है। वर्ग में प्राचीन भारत के सैनिक तंत्र का अन्वेष्णतमक  विश्लेषण अध्ययन के सुगमता एवं स्पष्ट विवेचन को ध्यान में रखते हुए प्राचीन भारत में शोधतंत्र तंत्र को कुल 7 भागों में प्रस्तुत किया गया है ।

 

प्रथम अध्याय

दितीय अध्याय

तृतीय अध्याय

चतुर्थ अध्या

पंचम अध्याय

छठा अध्याय 

सप्तम अध्याय

प्रथम अध्याय है _वेदों में आर्युवेद के आधारभूत सिद्धांत _

इसके इसके अंतर्गत 6 प्रमुख बिंदुओं में आयुर्वेद की वैदिक अवधारणा की विवेचना की गई है। यह उप बिंदु है पंचमहाभूत त्रिदोष ,धातु ,मल ,स्त्रोत्र, अग्नि।

*पंचमहाभूत

आकाश, वायु, गगन ,जल ,और पृथ्वी आयुर्वेद विज्ञान के अनुसार मानव शरीर का निर्माण इन्हीं पंचमहाभूत से होता है अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर में इनका संतुलन आवश्यक है।

*त्रिदोष

वात ,पित्त, और कफ इन तीनों को शरीर उत्पत्ति का कारण कहा गया है ।समस्त शरीर का क्रिया विज्ञान का सुचारू संचालन के त्रिदोष के संतुलन पर निर्भर करता है इनका शरीर में अ संतुलन हीरो का कारण बनता है।

*धातुएं

 हमारे जैविक शरीर की हड्डी कोशिकाओं उतको को मूलाधार माना गया है वह अन्य संरचनाओं में सप्तधातुओं को मूल आधार माना गया है। यह है रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन धातुओं का पोषण और संतुलन से आरोग्य का लक्षण प्राप्त होता है।

*मल

स्वेद (पसीना) मल मूत्र आदि शरीर में जैविक असंतुलन मे तथा भी कहा विषाक्त द्रव्य में निष्कासन में मुख्य भूमिका निभाने वाले संरचना मल सिद्धांत के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है।

*स्रोत 

 इसके अंतर्गत शिरा और ध्वनियों की व्याख्या की गई है। शरीर रंगों के विभिन्न आकार प्रकार और संचालन में इन्हीं की मुख्य भूमिका होती है।

*अग्नि 

जीवित शरीर में अग्नि ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। आयुर्वेद के सिद्धांत में तीन तरह की अग्नि का उल्लेख है। पचागिनी, धतवागिनी, भूतागिनी। ये सरीस्थ अग्निया ही दोष, धातु और मॉल में संतुलन बनाए रखने का कार्य करती हैं।

द्वितीय अध्याय हैं_ वेदों में संक्रमण और वि संक्रमण( संक्रमण की रोकथाम)

के अंतर्गत बैक्टीरिया वायरस आदि के संक्रमण के रोग और उनके आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के दृष्टि से रोकथाम के उपयोग की विवेचना है। आयुर्वेद चिकित्सा में संक्रमण का मूल कारण क्रीमी है। आयुर्वेद ग्रंथों में अनेक तरह की कृमियो का उल्लेख है। इन्हीं को अलंकारिक भाषा में राक्षस पिशाच असुर आदि कहा गया है। संक्रमण के उपचार में आयुर्वेदिक औषधियां सूर्य की किरणों और अग्नि तत्व का विवेचन किया गया।

तृतीय अध्याय है_ वेदों में शैल्य चिकित्सा  अवस्था

इसके अंतर्गत फोड़ा, घाव और अल्सर, रक्त गुल्म, की दर्दनाक स्थिति ,अंग भंग (fratcture) मूत्र संबंधी रोग और लिंफ (लशिका) नोड्स संबंधी रोगों का आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार शेल्य चिकत्सा विज्ञान का विस्तृत विवेचन किया  गया है ।उक्त व्याधियों के संबंध में सुश्रुत संहिता में विस्तार से इसके कारण लक्षण और उपचार संबंधी सिद्धांतों का उल्लेख है चिकित्सा प्रक्रियाओं का विवेचन शास्त्री सूत्रों के परिपेक्ष में करने के साथ ही उनके प्रचलित नाम और आधुनिक चिकित्सा क्षेत्र में प्रयोग होने वाले नामों का भी उल्लेख किया है।।

चतुर्थ अध्याय है_ वेदों में उपचारात्मक अवधारणा

उपचार का तात्पर्य कैसी विधि अथवा प्रक्रिया से है जिसमें रूप से क्षतिग्रस्त कोशिकाओं आदि की मरम्मत और पुनर्निर्माण संभव होता है शल्य चिकित्सा में वर्तमान में जो आधुनिक  उपचार प्रणालियां प्रचलित है उनमें लाभ के साथ-साथ हानियां भी जुड़ी है लेकिन सेल चिकित्सा की आयुर्वेदिक उपचार पद्धति के रोग के के साथ-साथ संभावित सभी दुष्प्रभाव के बचाव हेतु स्वास्थ्य प्रबंधन की तकनीकों को भी सम्मिलित किया गया है सुश्रुत संहिता में उल्लेख श्लोक संदर्भों के माध्यम से इस अध्याय में आयोजित को उपचारात्मक अवधारणा की विस्तार से प्रस्तुत किया गया है ।

 पंचम अध्याय है _वेदों में पुनर्निर्माण अथवा प्लास्टिक सर्जरी

इसके अंतर्गत जन्मजात व्याधियों एवं दर्दनाक स्थितियों में अंग प्रत्यारोपण से संबंधित आयुर्वेदिक चिकित्सा सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन किया गया है। आचार्य सुश्रुत में जन्मजात विकारों का कई वर्गों में उल्लेख किया है जैसे आदिवाल प्रवृत्ति, जलवाल प्रवृत्ति, दोसबाल प्रवृति, संघटबाल प्रवृत्ति, कॉल बाल प्रवृति, देव बाल प्रवृत्ति और स्वभाव बाल प्रवीती आदी।

उक्त वर्गीकरण के आधार पर रोगों का सही सही मिलान और उपचार संभव हो पाता है। आयुर्वेद में औषधियों एवं प्रबंधन तकनीकों के अलावा उपचार की सेल विधियों के अंतर्गत प्रत्यारोपण का भी विस्तृत विवेचन है। यही यह विधि मुख्यता वहीं अपनाई जाती है जहां रुग्ण अंग प्रत्यंगो को हटाकर उस स्थान पर वैकल्पिक अंगों का पुनर रोपण अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है।

सुश्रुत संहिता में उपचार की इस प्रत्यारोपण तकनीक की विवेचना विस्तृत मिलती है। नासिका संधान, कर्णसंधान, वोस्ट संधान आदि के रूप में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीकी भी प्राचीन शास्त्र में वर्णित है। वैदिक ज्ञान संपदा के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो ऋषि मुनियों ने चिकित्सा शास्त्र के रूप में एक उत्कृष्ट उपचार प्रणालियों स्वास्थ्य संवर्धन की तकनीकों को मानव सभ्यता के प्रारंभ में ही विरासत के रूप में हमें सौप दिया था। इस विरासत के महत्वपूर्ण सूत्र सिद्धांतों को हमारे वैज्ञानिक आधुनिक रूप में प्रयोग में लाते हैं।

शष्टम अध्याय हैं वेदों में विविध उद्धरण

इस अध्याय में आयुर्वेदिक सेल चिकित्सा सिद्धांत से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण पहलू एवं तकनीकों का विवेचन किया गया है। इसमें मुख्य रूप से संज्ञा हरण और संज्ञा स्थापन योग्य यज्ञ पैथी एवं विष विज्ञान को सम्मिलित किया गया है। संज्ञा हरण की तकनीक का प्रयोग सेल कार्य में संस्थान की चेतना शून्यता के लिए किया जाता है।

इसी तरह चेतना वापस लाने में संज्ञा स्थापन की तकनीक का उल्लेख है। योग्य से तात्पर्य शल्यक्रिया के अभ्यास और कुशलता से है यज्ञ पैथिक से वातावरण का शोधन और स्वास्थ्यवर्धक दोनों उद्देश्य पूरे होते हैं। विष विज्ञान के अंतर्गत
अगद तंत्र योग अगद तंत्र और आयुर्वेद में वर्णित विभिन्न प्रकारों के विष एवं उनकी प्रभाव कारिता के अनुसार चिकित्सा में उनकी प्रयोग विधि का उल्लेख है।

सप्तम अध्याय हैं_ वैदिक सेल चिकित्सा की अवधारणा एवं आधुनिक विज्ञान में संबंध

किस अध्याय में आयुर्वेद विज्ञान में प्रयुक्त सेल चिकित्सा में वर्णित अनेकों ऐसे तकनीकों एवं प्रक्रियाओं का विवेचन है जिन्हें आधुनिक विज्ञान द्वारा भी अपनाया गया है। क्रीमी संबंधित संक्रमण और उसके उपचार की प्रक्रिया रोकथाम संबंधी सिद्धांतों में दिनचर्या रात्रि चर्या , ऋतु चर्या महत्व भी आधुनिक चिकित्सा में बताया जाने लगा है। सेल चिकित्सा में सूर्य के किरणों को वर्तमान में विशेष उपकरणों के माध्यम से ऑपरेशन थिएटर में वैकल्पिक रूप से प्राप्त किया जाता है इसी तरह रोगों के निदान में भी आयुर्वेदिक अवधारणा का उपयोग आधुनिक चिकित्सा में देखा जा सकता है।

चिकित्सा विज्ञान की तुलना करना नहीं अपितु वैदिक चिकित्सा सिद्धांतों की स्वच्छता वैज्ञानिकता और समग्रता को सामने लाना है ताकि भारतीय चिकित्सा परंपरा के मूलभूत सिद्धांतों से जनमानस को अवगत कराया जा सके।

आयुर्वेद चिकित्सा में मानव जीवन को भौतिक मानसिक सामाजिक और आध्यात्मिक आयामों का संबंध में मानते हुए उपचार की प्रक्रियाओं को समग्रता से प्रस्तुत किया गया है जबकि आदमी चिकित्सा विज्ञान भौतिक शरीर को ही महत्व देता है। यह अध्ययन इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें प्रस्तुत चिकित्सा सिद्धांत वर्तमान में भी अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक है।
आयुर्वेद के ग्रंथों में दीर्घायु पाने के कई साधन बताए गए हैं। संतुलित नींद लेने वाला, दयाभाव रखने वाला, इंद्रियों पर संयम रखने वाला, नित्य क्रियाओं को न रोकने वाला व्यक्ति स्वस्थ रहता है। दिनचर्या व ऋतु के अनुसार नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति सेहत और लंबी उम्र पाता है। सुबह उठकर पानी पीने के साथ बाईं करवट सोने वाला, दिन में दो बार भोजन करने वाला, दिन-रात में छह बार मूत्र त्याग करने के साथ दो बार मल त्याग करने वाला व संयमित जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति ही लंबी उम्र पाता है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि गीले पैर भोजन करने से आयु बढ़ती है व गीले पैर सोने से आयु कम होती है। सूर्योदय से पहले उठना व स्नान करना भी लाभ पहुंचाता है।
महर्षि चरक ने कहा है कि पौष्टिक आहार करने वाला व्यक्ति बिना किसी रोग के छत्तीस हजार रात्रि अर्थात सौ वर्ष तक जीता है। भोजन को अच्छे से चबाकर खाने से दांतों का काम आंतों को नहीं करना पड़ता। पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है। सुबह के भोजन के साथ पानी, दोपहर के भोजन के बाद मट्ठा व रात के भोजन के बाद दूध पीने वाले को वैद्य की आवश्यकता नहीं पड़ती। भोजन करके टहलने से भी उम्र बढ़ती है।
यहां इन बातों का विवरण प्रदान करने के पीछे का मूल उद्देश्य एक ही है। ऋषि तंत्र द्वारा प्रदत इन महत्वपूर्ण भारतीय विद्या का पुनर्जीवन आधुनिक चिकित्सा के प्रति आकर्षित होकर भारत की इस मूल  विद्या को भूलते नजर आते थे आज यह तंत्र बृहद स्वरूप ले चुका है वर्तमान परिस्थितियों में चरक परंपरा का महत्वपूर्ण समय है 

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